Wednesday, November 7, 2018

एक औरत जिसने एक नहीं दो दो बार 'नोबल प्राइज' हासिल किया

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"वैज्ञानिक" यह शब्द सुनते ही हमारे दिमाग में एक अजीब सी तस्वीर बनती है. एक ऐसी तस्वीर जिसमे शायद बढ़े हुए बालों वाला, लंबी दाढ़ी वाला या चेहरे पर चश्मा लगाए, किसी लैब में बैठा हुआ, माइक्रोस्कोप में देखता हुआ या किसी विचार में खोया हुआ एक पुरुष. एक वैज्ञानिक के रूप में शायद ही किसी के दिमाग में महिला की तस्वीर बने. अब कोई कहे कि महिलाएं वैज्ञानिक होती ही नहीं हैं तो ऐसा भी नहीं है और ऐसा भी नहीं है कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं बुद्धिमान नहीं. बल्कि सच तो यह है इन सब के पीछे होता है हमारा सामाजिक ढांचा जिस में हम लड़कों को वही काम करने की इजाजत देते हैं, जिन्हें वह पसंद करते हैं चाहे वह मुश्किल हो या आसान. इसके विरुद्ध लड़कियों को शुरू से ही घर के कामों में लगा दिया जाता है. समाज के ऐसे बंटवारे की कारण ही महिलाएं कुछ नहीं बन पाती। यही वजह है कि बहुत कम महिलाएं वैज्ञानिक हुई है. इन्हीं महिला वैज्ञानिकों में से एक नाम है मैडम मैरी क्यूरी.

मैरी क्यूरी पहली ऐसी महिला जिन्होंने दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार 'नोबेल प्राइज' हासिल किया.


मैरी क्यूरी पहली ऐसी महिला जिन्होंने यह पुरस्कार एक नहीं, बल्कि 2 बार हासिल किया. एक बार भौतिक विज्ञान शोध के लिए और एक बार रसायन विज्ञान में शोध के लिए.

हम लोग तो वह लोग हैं जो सिर्फ कहानी पढ़ते हैं, लेकिन कुछ लोग वह भी होते हैं जो कहानी को लिखते हैं। दो नोबेल पुरस्कार हासिल करने का सफर क्यूरी के लिए जरा भी आसान न था. शुरू में उन्होंने तंगहाली के दिन देखे अपने घर की माली हालत को सुधारने के लिए बच्चों को क्लास देना शुरू किया. पति की असमय मृत्यु के बाद जिम्मेदारियों को बहुत ही हिम्मत के साथ निभाया. छोटी-छोटी दिक्कतों से लेकर बड़ी से बड़ी परेशानियों का भी सामना अकेले दम पर किया. मैरी क्यूरी के परिवार को ‘नोबेल फैमिली’ भी कहा जाता है, क्योंकि इस फैमिली में एक नहीं दो नहीं बल्कि तीन-तीन नोबेल पुरस्कार हैं. सबसे पहले मैरी और उनके पति को संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार दिया गया. इसके बाद मैरी की बड़ी बेटी इरीन को 1935 में रसायन के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार दिया गया और छोटी बेटी ईव को 1965 में शांति का नोबेल दिया गया. मैरी क्यूरी का परिवार ही मात्र एक ऐसा परिवार है जिसके सभी सदस्यों को नोबेल पुरस्कार मिला है.

मैरी क्यूरी की पैदाइश पोलैंड के वारसा शहर में 7 नवंबर 1867 को हुई. उनके पिता एक प्रोफेसर थे और माँ भी शिक्षिका थी. क्यूरी ने हमेशा से ही अपने घर पर अच्छा माहौल देखा. लेकिन आगे चलकर उन्हें तंगहाली का सामना भी करना पड़ा. उसका एक बड़ा कारण था. उनके पिता का शासन के विरुद्ध आवाज उठाना. उस वक्त जनता के साथ हो रही नाइंसाफी को देखते हुए उनके पिता ने इसका विरोध करना शुरू किया। दरअसल उस समय पोलैंड एक आजाद देश नहीं था. उस पर रूस के राजा ज़ार की हुकूमत थी. पोलैंड में कुछ लोग थे जो इस बात की मुखालफत करते थे और कुछ लोग रूसी राजा ज़ार के जासूस थे. क्यूरी के पिता जिस स्कूल में नौकरी किया करते थे. उस स्कूल के प्रिंसिपल इवानोव भी जार के जासूस थे. क्यूरी के पिता का झुकाव पोलैंड के आम लोगों की तरफ था और वह पोलैंड की आज़ादी की बात करते हैं इसी कारण उन्हें इवानोव ने नौकरी से निकाल दिया।


घर के गरीबी के दिन को देखते हुए क्यूरी ने आगे पढ़ाई के लिए अपनी बहन के पास पेरिस जाने का फैसला किया. उन्होंने पेरिस जाकर अपनी आगे की पढ़ाई को जारी रखा. वह नहीं चाहती थी कि उनकी पढ़ाई का खर्च उनकी बहन पर पड़े। इसलिए उन्होंने छात्रवृत्ति हासिल की. क्यूरी फ्रांस में डॉक्ट्रेट पूरा करने वाली पहली महिला है. इसी के साथ उन्हें पैरिस यूनिवर्सिटी में पहली महिला प्रोफेसर होने का गौरव भी हासिल है. इसी पैरिस यूनिवर्सिटी में उनकी मुलाकात 'पियरे क्यूरी' से हुई, जिनके साथ उन्होंने शादी कर ली. 1903 में क्यूरी ने पीएचडी पूरी की और इसी साल रेडियो एक्टिविटी की महत्वपूर्ण खोज के लिए उन्हें और उनके पति दोनों को संयुक्त रूप से भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला जो कि दुनिया में सबसे बड़ा पुरस्कार माना जाता है. 1911 में उन्हें दोबारा से 'आइसोलेशन ऑफ प्योर रेडियम' के लिए रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार दिया गया. इस तरह मैडम क्यूरी पहली वैज्ञानिक और पहली महिला वैज्ञानिक है जिनको दो अलग-अलग शाखाओं में दो बार नोबेल पुरस्कार दिया गया.

Marie Curie with Pierre curie

मैरी क्यूरी न सिर्फ एक अच्छी वैज्ञानिक थी बल्कि उस से भी ऊपर एक अच्छी इंसान थी. अपनी अमेरिका की यात्रा के दौरान उन्हें लोगों के प्यार और सम्मान के साथ साथ $100000 का चंदा भी मिला. अमेरिकी राष्ट्रपति ने उन्हें रेडियम की अनमोल धातु गिफ्ट के रूप में दी और साथ ही यह अधिकार भी दिया कि मैरी क्यूरी के न होने के बाद इस पर उनकी संतानों का अधिकार रहेगा. मगर त्याग की मूर्ति मैरी क्यूरी ने इस अधिकार की शर्त में एक बदलाव करवाया कि जरूरत पड़ने पर दूसरे लोग भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. उनका कहना था
“Radium is not to enrich anyone. It is an element for all people."
(रेडियम किसी को समृद्ध बनाने के लिए नहीं है। यह तत्व सभी लोगों के लिए है)
इसी तरह से उनके एक अच्छे इंसान होने के और भी कई सबूत हैं. इन्हीं में से एक है जब क्यूरी को नोबेल पुरस्कार में जो धनराशि मिली उसका इस्तेमाल भी आम लोगों की भलाई के लिए किए जाने वाले कामों में किया. उन्होंने कुछ अस्पताल बनवाए और प्रथम विश्व युद्ध के पीड़ित लोगों की सहायता के लिए स्वीडन में दान दिया. यहां तक कि युद्ध के मोर्चे पर भी वह स्वयं गई और एक्स-रे के उपचार के लिए कई सारे सहायता केंद्र खोले. ज्यादा से ज्यादा लोगों को सहूलियत हासिल कराने के लिए उन्होंने गाड़ी में एक चलता फिरता अस्पताल भी खोला. इस तरह से उन्होंने लगभग डेढ़ लाख रोगियों की मदद की. माली हालत काफी बेहतर हो जाने के बावजूद भी उन्होंने सादा जिंदगी को ही अपनाए रखा. क्यूरी ने अपनी सारी जिंदगी विज्ञान और आम आदमी के लिए काम करने में लगाई। यूरेनियम और थोरियम के बाद तेज रेडियो एक्टिविटी वाले तत्व की खोज क्यूरी ने की और जब इसका नाम रखने की बारी आई तब उन्होंने बहुत सोच कर इसका नाम अपने देश पोलैंड के नाम पर पोलोनियम रखा. मैरी क्यूरी ने एक बार कहा था.

“व्यक्ति मात्र के विकास के बगैर हम विश्व को सुंदर नहीं बना सकते। इस लक्ष्य के लिए हमें सदा प्रयासरत रहना होगा, मानवता के लिए भी अपनी जिम्मेदारियों को समझना होगा। हमारा प्रमुख कर्तव्य उनके लिए हो, जिनके लिए हम सर्वाधिक उपयोगी हो सकते हैं”

लीग ऑफ़ नेशंस ने विभिन्न राष्ट्रों के बीच भाईचारा कायम करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय कमेटी बनाई। क्यूरी को भी इसमें सदस्यता दी गई. एक सदस्य होने के नाते उन्होंने कमेटी के कामों में भाग लेना शुरू कर दिया.उन्होंने इस बात की भी शुरुआत कि सभी देशों में एक प्रकार की वैज्ञानिक शब्दावली बनाई जाए और वैज्ञानिकों उनके आविष्कारों की एक सूची तैयार की जाए. क्यूरी चाहती थी कि किसी भी काबिल वैज्ञानिक का चाहे वह किसी भी देश का हो गरीबी के चलते काम न रुके. मैरी क्यूरी जैसे लोग शायद दुनिया को और बेहतर बनाने के लिए ही आते हैं जो दुनिया से कुछ नहीं लेते और बहुत कुछ देकर जाते हैं.


क्यूरी का आख़िरी वक्त कुछ इस तरह गुजरा कि उनके हाथों ने उठना छोड़ दिया था और आंखें भी साथ नहीं देती थी. हर बार रेडियो एक्टिविटी के रूप में निकलने वाले विकरण को छूने से उनकी हड्डियों में और खून में जहर फैल गया था. वह साल 1934 था आसमान हल्का लाल था और सूरज निकलने वाला था. सूरज की पहली किरण ने मैरी के तकिए को छुआ. हमेशा की तरह पहली किरण के साथ जाग जाने वाली मैरी आज नहीं उठी और हमेशा के लिए गहरी नींद में सो गई. उनके दिल ने धड़कना छोड़ दिया था. मैरी का शरीर इस फ़ानी जहान से चला गया लेकिन वह आज भी हमारे बीच जिंदा है रेडियम के चमकते हुए कतरों में. ऐसा लगता है जैसे वह क़तरे बता रहे हैं. मैरी आज भी मौजूद है, मैरी मरी नहीं मैरी अमर है.
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