आज से लगभग साढ़े चार सौ बरस पहले दुनिया यह मानती थी कि पृथ्वी स्थिर है और सूरज पृथ्वी की परिक्रमा करता है, लेकिन एक आदमी ने ज़मीन को सूरज के चारों तरफ घुमा दिया, इससे पहले सूरज जमीन के चारों तरफ घूमा करता था और वह आदमी था अज़ीम साइंसदाँ गैलीलियो गैलिली। गैलीलियो को आधुनिक भौतिकी की नींव रखने के लिए जाना जाता है. उन्हें न्यूटन और आइंस्टीन दोनों ने ही आधुनिक भौतिकी का पितामह कहा है. वह एक इटालियन गणितज्ञ, खगोल शास्त्री, भौतिक विज्ञानी और दार्शनिक थे.
1564 की तारीख 15 फरवरी को वीन्सेन्ज़ो गैलीली के घर एक बच्चे का जन्म हुआ. जिसे दुनिया आज गैलीलियो के नाम से जानती है. गैलीलियो का पूरा नाम गैलीलियो दी वीन्सेन्ज़ो बोनैउटी द गैलीली था. जब वह 8 साल के थे, तब उनका परिवार फ्लोरेंस शहर चला गया था. उनकी शुरूआती शिक्षा मान्स्टेरी वाल्लोम्ब्रोसा में हुई थी. उनकी चित्रकला में भी बहुत दिलचस्पी थी और उन्होंने इसकी शिक्षा भी हासिल की थी. गैलीलियो रोमन कैथोलिक थे और ईसाई धर्म में उनकी गहरी रुची थी. अपनी किशोरावस्था में वह पादरी बनने के बारे में सोचा करते. लेकिन उनके पिता का सपना था कि वह चिकित्सा के क्षेत्र में काम करें और अपने पिता के कहने पर वह पीसा विश्वविद्यालय से चिकित्सा की शिक्षा लेने चले गए .लेकिन उनका मन चिकित्सा के क्षेत्र में नहीं लगा और उन्होंने उस की जगह गणित में शिक्षा हासिल की. गणित में डिग्री लेने के बाद 1588 मे उन्होने फ्लोरेन्स मे शिक्षक के रूप मे कार्य प्रारंभ किया। 1589 मे उन्होंने पीसा विश्वविद्यालय मे गणित व्याख्याता के रूप मे कार्य किया। 1592 में उन्होंने पोंडा विश्वविद्यालय में अपनी सेवाएं देना शुरू किया। वहां पर ज्यामिति यांत्रिकी और खगोल शास्त्र पढ़ाते थे.
इससे पहले लोगों की धारणा यह थी कि पृथ्वी सबसे शक्तिशाली है और यह सूरज, चांद, सितारे यह सब इसके चक्कर काटा करते हैं. यहां तक कि उस वक्त के दार्शनिक भी यही मानते थे कि यह पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में है. लेकिन गैलीलियो सारी दुनिया के खिलाफ बोल गए. उनकी इस बात से उस वक्त का सबसे बड़ा साम्राज्य रोमन साम्राज्य खासा नाराज हुआ, यहां तक कि उसने गैलीलियो को जिंदा जलाकर मारने की सजा दे डाली।
इससे पहले गैलीलियो ने एक दूरबीन बनाई थी और जुट गए थे दूसरे गोलों की सच्चाई जानने के बारे में. गैलीलियो से पहले कॉपरनिकस भी इस तरह का सिद्धाँत प्रतिपादित कर चुके थे कि सूर्य स्थिर है और पृथ्वी इस की परिक्रमा करती है. कॉपरनिकस की इस बात का खुलकर समर्थन किया गैलीलियो ने. लेकिन इस विचारधारा के उलट, उस समय ज्यादातर दार्शनिक और विज्ञानी उस समय के प्रसिद्ध दार्शनिक टालेमी के सिद्धांत का समर्थन करते थे. जिसके अनुसार पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र है .गैलीलियो ने कॉपरनिकस के सिद्धांत का समर्थन किया। उसके अनुसार सूर्य स्थिर है और सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं. इस सिद्धांत का समर्थन करने के लिए उन्हें ईसाई धर्म गुरुओं और दार्शनिकों के कट्टर विरोध का सामना भी करना पड़ा। गैलीलियो जब इस धारणा के विरुद्ध हुए तो सबसे ज्यादा आहत हुई चर्च की भावनाएं ठीक वैसे ही जैसे आज-कल कुछ बातों पर कुछ लोगों की भावनाएं बहुत जल्दी आहत हो जाती हैं. 1633 में रोमन साम्राज्य ने गैलीलियो को आदेश दिया कि वह सार्वजनिक तौर पर माफी मांगे और कहें कि कॉपरनिकस के सिद्धाँत को समर्थन देना उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी. चर्च की भावनाओं का सम्मान करने के लिए उन्होने माफ़ी भी मांगी। लेकिन 1632 में अपनी एक किताब “डायलाग कन्सर्निंग द टू चीफ वर्ल्ड सिस्टम” में सूर्य केंद्रीय सिद्धांत का समर्थन किया और फिर से चर्च ने उन्हें धर्म विरोधी घोषित कर दिया। रोमन साम्राज्य इस बात से बहुत नाराज हुआ और उन्हें जिंदा जलाकर मारने की सजा दी गई. मगर विश्व के कुछ और वैज्ञानिकों ने भी गैलीलियो को समर्थन देना शुरू कर दिया। अंतरराष्ट्रीय दबाव में गैलीलियो की सजा बदलकर आजीवन कारावास कर दी गई.
गैलीलियो ने अरस्तु के सिद्धांत को भी गलत साबित किया था. अरस्तु के सिद्धांत के अनुसार यदि पृथ्वी पर ऊपर से कम भार वाली और अधिक भार वाली 2 चीजों को एक साथ गिराया जाए तो अधिक भार वाली वस्तु नीचे की ओर जल्दी गिरेगी. इसको गलत साबित करने के लिए गैलिलियो ने एक ऐतिहासिक प्रयोग किया था. इस प्रयोग को देखने के लिए उस समय के प्रसिद्ध वैज्ञानिक, अध्यापक, बुद्धिजीवी और दार्शनिक इकट्ठा थे. उन्होंने पीसा की मीनार पर चढ़कर कम और ज्यादा वजन वाली 2 गेंदों को एक साथ नीचे गिराया. लोगों ने देखा कि दोनों एक साथ नीचे की ओर आ रही हैं. जबकि अरस्तु के सिद्धांत के अनुसार भारी गेंद पहले नीचे आनी चाहिए. लेकिन अरस्तु के सिद्धांत को गलत साबित करने पर तारीफ के बदले उन्हें कड़ी निंदा झेलनी पड़ी. उन्हें एक बुजुर्ग दार्शनिक का अपमान करने वाला एक घमंडी व्यक्ति कहा गया.
एक बार वह विश्वविद्यालय से लौट रहे थे, तब उन्होंने देखा एक आदमी ने लैंप में तेल भरा और उसको वापस लैंप पोस्ट रख दिया। वह लैंप पोस्ट दायीं ओर जाने में जितना समय लेता था उतना ही बायीं ओर। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने पेंडुलम के सिद्धांत का प्रतिपादन किया. इसी आधार उन्होंने मानव शरीर की चिकित्सा के लिए पल्समीटर बनाया था।
आखिर में गैलीलियो की ही बात सही पाई गई और सारी दुनिया आज भी उनकी ही बात मानती है. इटली के जिस शहर 'पीसा' ने कभी गैलीलियो को ईश्वर की 'ऐतिहासिक भूल' कहा था, 'ईश्वर की रचना का दोष' कहा था, उसी शहर ने 400 साल बाद सन 2009 को अंतर्राष्ट्रीय खगोलिकी वर्ष के रूप में मना कर 'ईश्वर की भाषा गणित है' कहने वाले गैलीलियो को श्रद्धांजलि दी. 400 साल बाद ईसाई धर्म की सर्वोच्च संस्था वेटिकन सिटी ने माना की गैलीलियो ईश्वर की भूल नहीं थे, बल्कि गैलीलियो को सजा देना चर्च की ऐतिहासिक भूल थी.



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