बचपन से एक वाक्य हमेशा ही सुनते आए हैं हम लोग "21 तोपों की सलामी". कभी किसी को मजाक में भी सम्मान देने की बात आती है तो हम बोलते हैं इसके लिए 21 तोपों की सलामी. इक्कीस तोपों की सलामी हमेशा ही सम्मान से जुड़ी रही और सम्मान का प्रतीक मानी जाती रही. आखिर क्या बला है यह इक्कीस तोपों की सलामी आइए जानते हैं.
कुछ अनुमानों के अनुसार इक्कीस तोपों की सलामी की शुरुआत 14वीं सदी के आसपास की पता चलती है. ऐसा माना जाता है कि इसकी शुरुआत 14वीं शताब्दी में हुई होगी. उस समय वायु सेना के स्थान पर नौसेना, थल सेना की ज़्यादा मददगार होती थी. दो नौसेनाओं के युद्ध के बाद जीती हुई नौसेना हारी हुई नौसेना से तमाम असलाह गोला बारूद वगैरा ले लेती थी, जिस से हारी हुई नौसेना दोबारा उस पर हमला न कर सके. उस समय एक जहाज पर 7 तोपे हुआ करती थी. 7 तोप होने के पीछे भी एक कारण था. वह यह कि 7 की संख्या को शुरू से ही शुभ माना जाता है. ऐसा माना जाता है कि आसमान भी 7 हैं, संगीत में सुर भी 7 हैं और इंद्रधनुष में रंग भी 7 .इसीलिए जहाज पर तोपे भी 7 रखी जाती थी. जब एक देश की सेना, दूसरे देश की सेना को अपने इलाके में आने से रोकती थी, तो एक किनारे से नौसेना के एक के जवाब में तीन तोपे दागा करती थी. इस तरह 7 तोपों के बदले 21 तोपें दागी जाती थी. इक्कीस तोपों की सलामी की शुरुआत कब हुई, कैसे हुई, कहाँ पर हुई, किसने की, इन सब सवालों के निश्चित उत्तर तो किसी को नहीं पता है.
अंग्रेजी वेबसाइट balance.com और todayifoundout.com के अनुसार दुनिया में व्यापारी एक से दूसरे देश पानी के जहाज के द्वारा ही जाया करते थे, उस समय समुद्री लुटेरों का होना एक आम बात थी. सेना के अलावा व्यापारी भी अपनी सुरक्षा के मद्देनजर साथ में तोपें ले कर चला करते थे. 14वीं सदी के आसपास सेना के अलावा व्यापारियों द्वारा तोपें चलाने का उद्देश्य दूसरे देश को यह बताना होता था कि वह केवल व्यापारी हैं और दूसरे देश में व्यापार करना चाहते हैं. उनका उद्देश्य कोई युद्ध करना नहीं है. इसमें कितनी तोप के गोले छोड़े जाएंगे यह व्यापारियों के लिए एक नियम होता था, जबकि दुश्मन देश की नौसेना गिन कर गोले नहीं छोड़ती थी. लगभग 3 सदियों तक इसी रूप में तोपें चलाने का प्रचलन रहा. 17वीं सदी आते आते इसमें बदलाव आना शुरू हुआ. ब्रिटिश सेना ने 17वी शताब्दी में पहली बार तोपों को शाही खानदान के लिए इस्तेमाल किया. इन्हें सरकारी स्तर पर चलाया जाने लगा यानी युद्ध के मैदान के बाहर भी. शाही खानदान को 1730 तोपों की जबरदस्त सलामी दी गई और ऐसा माना जाता है इस घटना के बाद से ही किसी को सम्मान देने या खुशी मनाने के लिए तोपों की सलामी का रिवाज चल पड़ा।
18वीं सदी में अमेरिका ने भी इसे सम्मान के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया. सन 1810 में अमेरिका में इसे सरकारी रूप से लागू किया गया. 1842 में पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति को इक्कीस तोपों की सलामी कानूनी रूप से जरूरी कर दी गई और अमेरिका से शुरू हुई यह सलामी 19वीं सदी आते आते दूसरे महाद्वीपों और देशों में भी फैल गई. दुनिया के बड़े बड़े देशों से लेकर छोटे छोटे देश और उनके नेताओं व राजाओं को भी तोपों की सलामी का प्रचलन बढ़ता गया. इस वक्त लगभग दुनिया के सभी देश अपने राजाओं या नेताओं को तोपों के द्वारा सलामी देकर सम्मानित करते हैं. 'गार्ड ऑफ ऑनर' एक तरह का सम्मान होता है जो 21 तोपों की सलामी के बराबर माना जाता है. दुनिया में कुछ देश ऐसे भी हैं जो अपने यहां आने वाले दूसरे देश के राजाओं, नेताओं या उनके समकक्ष लोगों को गार्ड ऑफ ऑनर देते हैं. आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगभग हर देश में इक्कीस तोपों की सलामी का प्रचलन है. अलग-अलग देशों में सम्मान के तौर पर अलग अलग संख्या में तोपों की सलामी दी जाती थी. जैसे ब्रिटेन की महारानी को 101 तोपों की सलामी दी जाती थी, जबकि दूसरे राजाओं को 31 या 21 की संख्या में सलामी दी जाती, लेकिन फिर ब्रिटेन ने महारानी के लिए भी इक्कीस तोपों की सलामी निर्धारित की. ब्रिटेन को देखते हुए बाक़ी देशों ने भी इक्कीस तोपों की सलामी की प्रथा को अपनाया। अमेरिका में भी उच्च पद पर कार्यरत अधिकारियों को इक्कीस तोपों की सलामी देने की ही प्रथा है.
भारत में तोपों की सलामी को लेकर क्या परंपरा है
आइए जानते हैं भारत में तोपों की सलामी को लेकर क्या परंपरा है. भारत में यह परंपरा ब्रिटिश शासन के समय से ही है. भारत में तोपों की सलामी की परंपरा को बहुत बड़ा सम्मान समझा जाता था. यहां के राजाओं को 19 या 17 तोपों की सलामी दी जाती थी. क्योंकि इक्कीस तोपों की सलामी केवल ब्रिटिश अधिकारियों के लिए ही थी और भारत के किसी भी राजा या रियासतों के प्रमुख लोगों को उनसे कम माना जाता था. इसलिए 19 या उनसे भी छोटे राजाओं को 17 तोपों की सलामी दी जाती. भारत में राष्ट्रपति को 21 तोपों की सलामी दी जाती है. भारत में राष्ट्रपति पद सबसे बड़ा पद होता है. इसलिए अधिकतम यानी इक्कीस तोपों की सलामी निर्धारित की गई है. गणतंत्र दिवस परेड के दौरान इक्कीस तोपों की सलामी दी जाती है. यह तोपे कोई आम तोपे नहीं है बल्कि 1941 में बनी 7 विशेष तोपे जिन्हें '25 पाउण्डर्स' कहा जाता है. राष्ट्रगान शुरू होते ही पहली सलामी दी जाती है और 52 सेकंड के राष्ट्रगान के बाद आखिरी सलामी दी जाती है.लेकिन ऐसा नहीं है कि हर पद के लिए इक्कीस तोपों की सलामी ही दी जाए. भारतीय वायु सेना के मार्शल अर्जन सिंह को राजकीय सम्मान के तौर पर 17 तोपों की सलामी दी गई थी. अलग-अलग पदों के लिए अलग-अलग तोपों की संख्या निर्धारित की गई है. सलामी हमेशा विषम संख्या में ही दी जाती है यानी 21, 19 या 17. राष्ट्रपति को 21, सेना के 4 स्टार जनरल को 17 तोपों की सलामी से नवाजा जाता है, 3 स्टार जनरल को 15 तोपों की सलामी, 2 स्टार जनरल की इज्जत अफजाई के लिए 13 और 1 स्टार जनरल को 11 तोपों की सलामी दी जाती है.
इस तरह कभी ब्रिटेन में शुरू हुई यह प्रथा आज दुनिया के छोटे बड़े हर देश में फैल गई और 21 तोपों की सलामी हर देश में हाई रैंक पदों के लिए एक आम बात हो गई.




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